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Showing posts from March, 2010

सरकार गंभीरता से ले राजस्थानी सिनेमा को

सरकारी उपेक्षा का ही परिणाम है कि सात दशक में भी पहचान नहीं बना पाया राजस्थानी सिनेमा, संवारने की घोषणाएं तो कई हुईं, लेकिन अमल नहीं हुआ संतोष निर्मल
जयपुर. राजस्थानी फिल्में अपने सात दशक (६८ वर्ष) पूरे करने जा रही हैं। चिंता की बात यह है कि ये अभी भी अपनी पहचान को तरस रही हैं। राजस्थानी फिल्मों से जुड़े लोग अलग-अलग पड़े हुए हैं। कुछ हिम्मत करके अपने बल पर फिल्में बना भी रहे हैं, पर न तो उन्हें सिनेमाघरों का समर्थन मिलता है न और ही सरकार का। उनकी फिल्में छोटे शहरों व कस्बों तक ही सीमित होकर रह जाती हैं। न तो राजस्थानी फिल्मों को मनोरंजन कर से मुक्त किया जाता है, न उसकी शूटिंग के लिए लोकेशन के शुल्क में छूट दी जाती है। उनसे वही शुल्क वसूला जाता है, जो करोड़ों के बजट वाली हिंदी फिल्मों के निर्माता से लिया जाता है। ऐसे में राजस्थानी फिल्मों के निर्माता-निर्देशक अपनी फिल्मों की शूटिंग गांवों व इसी तरह की अन्य जगह पर करने को मजबूर होते हैं। यही कारण है कि सांस्कृतिक रूप से धनी राजस्थान की फिल्मों में ही राजस्थान बहुत कम नजर आता है।
समय-समय पर सरकार राजस्थानी फिल्मों की सहायता की घोषणा अवश्य …

पहचान क्यों नहीं बना पा रही हैं राजस्थानी फिल्में विषय पर गोष्ठी 29 को

विशिष्ट वक्ता फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर श्याम सुंदर झालानी, निर्माता-निर्देशक मोहन कटारिया तथा अरुण मुदगल होंगे
जयपुर. राजस्थानी फिल्मां रो उच्छब आयोजन समिति की ओर से 29 मार्च को दोपहर 3 बजे होटल लक्ष्मी विलास में "पहचान क्यों नहीं बना पा रही हैं राजस्थानी फिल्में" विषय पर एक गोष्ठी का आयोजन किया जाएगा।
आयोजन समिति के अध्यक्ष राजेंद्र बोड़ा ने बताया कि कार्यक्रम की अध्यक्षता सूचना एवं जनसंपर्क राज्यमंत्री अशोक बैरवा करेंगे तथा विशिष्ट अतिथि सेंसर बोर्ड के पूर्व सदस्य राजीव अरोड़ा होंगे। विशिष्ट वक्ता फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर श्याम सुंदर झालानी, निर्माता-निर्देशक मोहन कटारिया तथा अरुण मुदगल होंगे।

लियाकत अजेमरी

जन्म : राजस्थान के सीकर कस्बे में।
संगीतकार के रूप में पहली राजस्थानी फिल्म : चूनड़ी।
अब तक : बाबा रामदेव, लक्ष्मी आई आंगणें, छम्मक छल्लो और हिवड़े स्यूं दूर मत जा जैसी कई फिल्मों में संगीत निर्देशन।
विशेष : संगीत में डिप्लोमा- इंस्ट्रूमेंट वायलिन और पियानो में विसारत। कई हिंदी फिल्मों व धारावाहिकों में संगीत निर्देशन। 
इन दिनों : आने वाली फिल्मों व धारावाहिकों में संगीत देने में व्यस्त।

मोहन कटारिया

जन्म : राजस्थान की राजधानी जयपुर के विसनावाला में।
पहली निर्देशित राजस्थानी फिल्म : धरती रो धणी।
अब तक : डिग्गीपुरी का राजा व धरती रोधण का निर्माण। लाखा, जय करणी माता, लाडोबाई एवं डिग्गीपुरी का राजा में चीफ असिस्टेंट के रूप में कार्य।
विशेष : राजस्थानी भाषा से विशेष लगाव। तीसमारखां सहित कई राजस्थानी भाषी धारावाहिकों का निर्माण-निर्देशन व अभिनय।
इन दिनों : अपने बैनर की नई फिल्म व धारावाहिक के निर्माण की तैयारियों में व्यस्त।

संदीप वैष्णव

 जन्म : पाली जिले की मारवाड़ जंक्शन के धनला गांव में।
पहली राजस्थानी फिल्म : थारी-म्हारी
अब तक : नौ राजस्थानी फिल्मों का निर्माण व निर्देशन।
विशेष : आंकड़ों के हिसाब से देखें तो अब तक सबसे ज्यादा राजस्थानी फिल्में बनाने वाले निर्माता निर्देशक हैं फ्लाइट इंजीनियर संदीप वैष्णव। बॉलीवुड के कई वरिष्ठ निर्देशकों के साथ काम किया। राजस्थानी भाषा व फिल्मों से विशेष लगाव।
आने वाली फिल्म : बाई सुगना चाली सासरे।
इन दिनों : बाई सुगना चाली सासरे के निर्माण में व्यस्त।

लोकेश मेनारिया

 जन्म : उदयपुर।
पहली राजस्थानी फिल्म : दूसरी विदाई ()।
अब तक : कई वृत्तचित्रों का लेखन व निर्देशन। राजस्थानी में निर्देशक के रूप में पहली फिल्म।
आने वाली फिल्म : दूसरी विदाई।
इन दिनों : अपनी फिल्म दूसरी विदाई के प्रमोशन व रिलीज के लिए वितरकों से संपर्क में व्यस्त।

क्यों नहीं बनी राजस्थानी फिल्मों की पहचान?

होटल लक्ष्मी विलास में गोष्ठी 29 को
जयपुर . राजस्थानी फिल्मां रो उच्छब आयोजन समिति की ओर से 'क्यों नहीं बनी राजस्थानी फिल्मों की पहचान' विषय पर होटल लक्ष्मी विलास में 29 मार्च को गोष्ठी आयोजित की जाएगी। इसमें राजस्थानी सिनेमा से जुड़े निर्माता-निर्देशक, कलाकार व वितरक विचार व्यक्त करेंगे।

जस्मिन कुमार

जन्म : अजमेर जिलक के ब्यावर कस्बे में।
पहली राजस्थानी फिल्म : प्रीत ना जाने रीत।
अब तक : दो राजस्थानी फिल्मों में अभिनय।
इन दिनों : आने वाली फिल्म राजू बण गयो एमएलए की शूटिंग में व्यस्त।

हितेश कुमार

जन्म : अजमेर जिला के ब्यावर कस्बे में।
पहली राजस्थानी फिल्म : ओ जी रे दीवाना।
अक तक : तीन राजस्थानी फिल्मों में अभिनय। धारावाहिक वतन के रखवाले में भी भूमिका निभाई।
इन दिनों : आने वाली फिल्म में व्यस्त।

मास्टर कैजर

उम्र: 8 साल जन्म स्थान : मुंबई
पहली राजस्थानी फिल्म : हिवड़े स्यूं दूर मत जा
विशेष : जानी मानी अभिनत्री नीलू व अभिनेता अरविंद कुमार के पुत्र।
अब तक : कई एड फिल्म्स व वतन के रखवाले धारावाहिक में अभिनय।

मोहन कटारिया

जन्म : राजस्थान की राजधानी जयपुर के विसनावाला में।
पहली राजस्थानी फिल्म : बेटी राजस्थान री।
अब तक : 15 राजस्थानी फिल्मों में अभिनय किया। नायक सहित विभिन्न भूमिकाओं का सफलतापूर्वक निर्वाह। राजस्थानी में धरती रो धणी व डिग्गपुरी का राजा फिल्मों का निर्माण।
विशेष : राजस्थानी भाषा से विशेष लगाव। तीसमारखां सहित कई राजस्थानी भाषी धारावाहिकों का निर्माण-निर्देशन व अभिनय।
इन दिनों : अपने बैनर की नई फिल्म व धारावाहिक के निर्माण की तैयारियों में व्यस्त।

सन्नी अग्रवाल

जन्म : राजस्थान के सीकर कस्बे में।
पहली राजस्थानी फिल्म : बापू जी ने चाहे बीनणी।
अब तक : जय जीण माता और म्हारा श्याम धणी दातार सहित कई राजस्थानी फिल्मों में अभिनय। 
विशेष : ज्यादातर धार्मिक व सामाजिक फिल्मों में ही अभिनय। धार्मिक फिल्मों का निर्माण व निर्देशन भी।
सम्मान-पुरस्कार : राजस्थानी रत्न अवार्ड और मरुधरा गौरव अवार्ड, धर्म रत्न और कर्मवीर पुरस्कार सहित कई अन्य सम्मान।
इन दिनों : एक प्रसिद्ध भक्त के जीवन पर आधारित अपनी नई फिल्म की तैयारियों में व्यस्त।

रमेश गुणावता

जन्म : राजस्थान के दौसा जिले की लालसोट तहसील के गांव उदेपुरा।
पहली राजस्थानी फिल्म : कृपा करो सूंधा माता।
अब तक : राजस्थानी में दो फिल्में की हैं। दूसरी फिल्म है गुरु कृपा। इसके अलावा हिंदी धारावाहिकों में सक्रिय। 
सम्मान-पुरस्कार : कृपा करो सूंधा माता फिल्म
के लिए बेस्ट हास्य कलाकार का पुरस्कार।
इन दिनों : पपळाज माता पर बनाई जाने वाली नई फिल्म की तैयारियों में व्यस्त।

अरविंद कुमार

जन्म : राजस्थान के अजमेर जिले में स्थित ब्यावर कस्बे में।
पहली राजस्थानी फिल्म : मां राजस्थानी
अब तक : सात राजस्थानी फिल्मों में अभिनय। इनमें से पांच में नायक की भूमिका निभाई।
विशेष : राजस्थानी सिनेमा की सिनेमा की जानी-मानी अभिनेत्री नीलू से विवाह। मानव जागृति मिशन के ब्रांड एंबेसेडर। राजस्थानी संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न प्रांतों मे सांस्क्ृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति।
इन दिनों : पत्नी नीलू के साथ अपने बैनर की नई फिल्म की तैयारियों में व्यस्त।

नीलू

जन्म :राजस्थान के फतेहपुर शेखावाटी क्षेत्र में।
पहली राजस्थानी फिल्म :सुपातर बीनणी।
अब तक :17 फिल्मों में नायिका के रूप में अभिनय किया। अब तक विभिन्न बैनर्स की करीब 45 फिल्मों में विभिन्न भूमिकाओं का सफलतापूर्वक निर्वाह।
विशेष : राजस्थानी सिनेमा में राजस्थान की श्री देवी के नाम से मशहूर। राजस्थानी फिल्मों में सबसे ज्यादा नायिका के रूप में अभिनय करने का रिकॉर्ड।
सम्मान-पुरस्कार
1. सन्  2000 में बेस्ट एक्ट्रेस अवार्ड, तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रदान किया।
2. सन् 2007 में बेस्ट एक्ट्रेस अवार्ड, तत्कालीन राज्यपाल श्रीमती प्रतिभा पाटील ने प्रदान किया।
इन दिनों : अपने बैनर की नई फिल्म के निर्माण की तैयारियों में व्यस्त।

जगदीश व्यास

जन्म : 1936, जोधपुर में, निवास-बीकानेर।
पहली राजस्थानी फिल्म : बाबा सा री लाडली (1961)।
अब तक : 20 से अधिक राजस्थानी फिल्मों में अलग-अलग भूमिकाओं का सफलतापूर्वक निर्वाह।
विशेष : 40 साल से चरित्र अभिनेता के रूप में सक्रिय, राजस्थानी सिनेमा की सही मायने में पहली फिल्म कही जाने वाली फिल्म बाबा सा री लाडली से शुरू हुई अभिनय यात्रा अब तक अनवरत जारी। राजस्थानी फिल्मों की शुरुआत से वर्तमान तक अभिनय करने वाले जीवित अभिनेताओं में से एक।
इन दिनों : अपने बैनर की नई फिल्म के निर्माण की तैयारियों में व्यस्त।

राजस्थानी सिनेमा मेरा पहला प्यार

फ्लाइट इंजीनियर संदीप वैष्णव ने अब तक नौ राजस्थानी फिल्में बनाई हैं और दसवीं फिल्म निर्माणाधीन हैं। अगर आंकड़ों के हिसाब से देखें तो सबसे ज्यादा राजस्थानी फिल्में इन्होंने ही बनाई हैं शिवराज गूजर
राजस्थानी सिनेमा को कई निर्माता-निर्देशकों ने अपनी औलाद की तरह पाला पोसा है। कई तरह की परेशानियों के बावजूद वे नहीं टूटे और आज भी उसे जिंदा रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हालांकि अड़सठ साल में 110 या 111 फिल्मों का आंकड़ा कोई उत्साहजनक नहीं है, लेकिन यह क्या कम है कि इतनी फिल्में तो राजस्थानी में बनी। ऐसे ही लोगों के दम से आज राजस्थानी सिनेमा अपनी पहचान कायम रख पाया है। इन्हीं लोगों में से एक हैं-संदीप वैष्णव।
फ्लाइट इंजीनियर संदीप वैष्णव ने अब तक नौ राजस्थानी फिल्में बनाई हैं और दसवीं फिल्म निर्माणाधीन हैं। अगर आंकड़ों के हिसाब से देखें तो सबसे ज्यादा राजस्थानी फिल्में इन्होंने ही बनाई हैं। पाली जिले की मारवाड़ जक्शन तहसील के धनला गांव के इस युवा ने थारी म्हारी  फिल्म से राजस्थानी फिल्मों में कदम रखा। इसके बाद इन्होंने कभी मुड़कर पीछे नहीं देखा। कई तरह की परेशानियां भी आईं, मगर ये डिगे नहीं। …

लोग मिलते गए, कारवां जुड़ता गया

जिनसे बात हुई, सबने कहा: तुम काम करो, हम तुम्हारे साथ है 'राजस्थानी फिल्मां रो उच्छब' में हमारा प्रयास है कि हम हर उस व्यक्ति से संपर्क कर सकें जो राजस्थानी सिनेमा के लिए कुछ कर रहा है। जब हमने इस पर काम करना शुरू किया तो जो सबसे बड़ी परेशानी आई वो यह थी कि अधिकांश कलाकारों, निर्माता-निर्देशकों, लेखकों, गीतकारों-संगीतकारों और सिनेमेटोग्राफरों के संपर्क नंबर पाना। जब चल पड़े तो यह समस्या भी अपने-आप हल होती चली गई। एक से संपर्क हुआ तो दूसरे का पता चला, दूसरे से मिले तो तीसरे का, और इस तरह सिलसिला चल निकला।

नीलू-अरविंद ने कहा-जरूर आएंगे 


निमंत्रण देने के लिए जब मैने राजस्थानी फिल्मों की जानी-मानी अभिनेत्री नीलू को फोन किया तो उस समय वे मुंबई मैं थीं। उन्हें जब मैंने 'राजस्थानी फिल्मां रो उच्छबÓ के बारे में बताया तो वे काफी खुश हुईं। उन्होंने रुचि दिखाते हुए कार्यक्रम के बारे में सारी जानकारी ली। साथ ही उन्होंने अपने पति अरविंद से भी बात करवाई। देानों ने कार्यक्रम में शामिल होने की हामी भरते हुए कहा, हमारी ही फिल्मों के कार्यक्रम में नहीं आएंगे तो फिर किसमें आएंगे। उनकी नई फिल्म…

राजस्थानी फिल्मों की श्रीदेवी हैं नीलू

नीलू की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब तक बनी १११ फिल्मों में से पैंतालिस में वो हैं  संतोष निर्मल

राजस्थानी फिल्मों का जिक्र आते ही एक नाम सामने आता है, वह नाम है नीलू का। राजस्थान का बच्चा - बच्चा नीलू को जानता है। आज भी गांवों में नीलू के नाम से भीड़ उमड़ पड़ती है। नीलू ने राजस्थानी फिल्मों में  एक से एक किरदार निभाए हैं। एक ओर जहां भावपूर्ण दृश्यों में उनका जवाब नहीं है, वहीं दूसरी ओर वह कामेडी और एक्शन दृश्यों में भी किसी से कम नहीं पड़तीं। भोमली, रमकूड़ी- झमकूड़ी इसके उदाहरण हैं। नीलू की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब तक बनी १११ फिल्मों में से पैंतालिस में नीलू हैं। यह नीलू की काम के प्रति लगन ही है कि निर्माता- निर्देशक उन्हें ही लेना पसंद करते हैं। नीलू सिर्फ अभिनय तक ही सीमित नहीम रहीं, बल्कि फिल्म निर्माण में भी वह आगे आईं। अपने पति अरविंद के साथ उन्होंने कई फिल्मों का निर्माण किया। राजस्थानी फिल्मों के प्रति उनकी लगन व सक्रियता देखते ही बनती है। राजस्थान की श्रीदेवी कहलाए जाने के बावजूद भी उन्होंने कभी स्टार जैसे नखरे नहीं दिखा…

मायड़ भाषा स्यूं छूटे कोने नेह

फिल्म वितरक श्याम सुंदर झालाणी 1962 से कर रहे हैं राजस्थानी फिल्मों का वितरण, अब तक 18 फिल्में की रिलीज, लारला दिनां मैं राजस्थानी फिल्मां पर लिख रया छे एक किताब

शिवराज गूजर
राजस्थानी फिल्मां का बारा मैं जाणबा के लिए यां स्यूं जुड़ेड़ा लोगां स्यूं मिलबो शुरू करया। म्हाने अब अस्या आदमी की जरूरत छी ज्यो राजस्थानी फिल्मां का बारा मैं रबी-रबी (सब) जाणतो होवे। जींने पूछ्या सब एक ही नाम बतायो-फिलम डिस्ट्रीब्यूटर श्याम सुंदर झालाणी।
घणी कोशिश के बाद वांका फोन नंबर मिल्या वे भी ऑफिस का। उठे फोन कर्या तो पतो चाल्यो के वे तो घरां गयोड़ा छे। घरां का नंबर लिया। पतो चाल्यो वे तो इवनिंग वाक पर निकळेड़ा छे। वांका पोता विशाल झालाणी स्यूं मोबाइल नंबर ले अर वां स्यूं बात करी। मकसद बतायो तो घणां राजी हुया। कया, पूछबा की बात ही कोने-ऑफिस आ जाओ। दूसरे दिन दोपहर डेढ़ स्यूं दो बज्यां के बीच को वक्त तय होयो। झालाणी जी स्यूं बात होबा के बाद मन मैं घणी तसल्ली हुई। लाग्यो जाणे आधो मैदान तो मार लियो। निर्मल जी अर बोड़ा जी ने फोन कर झालाणी जी स्यूं हुई बात अर मिलबा को वक्त बतायो। वे भी दोन्यूं या बात जाण अर घणां र…

क्यों नहीं बन रहीं राजस्थानी फिल्में

संतोष निर्मल
राजस्थानी फिल्मों का नाम आते ही कुछ लोग ऐसा मुंह बनाते हैं, जैसे कोई बदजायका चीज मुंह में आ गई हो। ये लाग राजस्थानी फिल्मों को बड़ी उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं। उनका कहना होता है कि राजस्थानी फिल्में भी कोई देखने की चीज है। राजस्थानी फिल्मों की इस दयनीय स्थिति के लिए आखिर आज कौन जिम्मेदार है। क्यों राजस्थानी फिल्मों को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा।  शायद ही कभी किसी ने इस पर गंभीरता से मनन करने की जरूरत महसूस की होगी। लोग यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाना चाहते हैं कि राज्य सरकार कुछ मदद ही नहीं करती, तो राजस्थानी फिल्में कैसे बनें। यानी ले- देकर ठीकरा सरकार के सिर पर फोड़ दिया जाता है।
बालीवुड में राजस्थानी फाइनेंसरों व निर्माताओं की धाक क्या कभी किसी ने सोचा है कि बालीवुड में राजस्थानी फाइनेंसरों व निर्माताओं की धाक होने के बावजूद राजस्थानी फिल्मों की ऐसी बुरी  हालत क्यों है। क्यों राजस्थानी फिल्मों को अपने ही लोगों के हाथों अपमान सहना पड़ रहा है। इसका कारण यह है कि मुम्बई में बसे इन समर्थ राजस्थानी फिल्मकारों ने राजस्थानी फिल्मों को भुला दिया है। शायद वह इन फिल्…

'नजराणां' स्यूं शुरू हुयो सफर

आपणी सबस्यूं पैली फिल्म छी नजराणों। या फिल्म 1942 में बणी। या बात सब खे चे, पण ईं फिल्म ने देख बा वाळो कोने मिल्यो। ज्यादातर सुणेड़ी बात ही खे चे।  ईं के बाद सही तरीका स्यूं आबा हाळी फिल्म छी बी के आदर्श की 'बाबो सा री लाडली'। या फिल्म नजराणां के करीब 19 साल बाद 1961 मैं आई। ईं के बाद ढंग स्यूं राजस्थानी फिल्मां बणबो शुरू हुई। कईं फिल्मां कमाई का मामला मैं नाम भी करी। राजस्थानी संगीत को तो कोई सानी ही कोने। ज्यो भी गीत आया लोगां की जुबान पर चढ़ग्या। करीब 68 साल हो बा ने आया आपां ने फिल्मां बणातां, पण सौ को आंकड़ो  गए साल ही पार कर पाया। सौवी फिल्म बणबा को मान मिल्यो 'ओढ़ ली चुनरिया नैं'।
खे बा को मतलब यो छे के आपां फिल्मां तो बणा रया छां पण चाल मंदरी छे। जीतणूं छे तो आपां ने तो बेगो चालणों पड़ेलो। बाधा सब का गैला मैं आवे छे, पण ज्यो हंसतो-हंसतो कूद ज्या छे वोई रण जीत अर आवे छे। आपां ने भी आपणी माटी को, आपणी भाषा को मान बढ़ाणों छे। आवो संकळप ल्यां। आपणां सिनेमां नै, आपणी भाषा ने अतरो धनवान करां ला कै लोग आपां ने पूछबा आवे ला।

...तो यह तय रहा

यूं बना राजस्थानी फिल्म फेस्टिवल का विचार
शाम का वक्त था। संतोष निर्मलजी और मैं थड़ी पर चाय पी रहे थे। बातों-बातों में राजस्थानी सिनेमा का जिक्र चल पड़ा। साठ साल के इतिहास में मात्र सौ फिल्में! वाकई झटका देने वाला सच था। चर्चा चली तो कईं बातें निकल कर सामने आई। हिंदी सिनेमा के एक गाने या एक सेट के खर्च में जब एक राजस्थानी फिल्म बन सकती है तो क्यों नहीं कोई फाइनेंसर इनमें पैसा लगाता, जबकि बॉलीवुड में राजस्थानी फाइनेंसरों की अच्छी खासी जमात है। एक वजह, टेरेटरी कम होने की वजह से फिल्म की लागत नहीं निकल पाती, शायद इसलिए भी लोग कदम आगे नहीं बढ़ा पाते। मजे की बात देखिए कि राजस्थानी भाषा में बनी फिल्मों को राजस्थान की अपनी राजधानी में ही थिएटर नहीं मिलते। ले देके मोती महल या फिर कोई छोटा-मोटा और। ऐसे ही कई सवालों के दौरान विचार आया कि  क्यों न इन सब बातों पर बड़े स्तर पर चर्चा हो ताकि हमारे सिनेमा की प्रगति की कोई राह निकले। ...और इसके लिए सबसे बढिय़ा विचार यही लगा कि राजस्थानी फिल्म फेस्टिवल किया जाए। तो यह तय रहा, के साथ हम लोग वहां से उठे।
दो चार दिन बाद हमने इसकी हलकी रूपरेखा बनाई और उन लोगों…

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