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Showing posts from April, 2010

...नहीं तो हम बताया करेंगे-बेटा कभी राजस्थानी फिल्में भी बना करती थीं

हाल ही रिलीज हुई राजस्थानी फिल्म 'सुपात्तर बेटी' में मुख्य खलनायक की भूमिका निभाई है राज जांगिड़ ने। भीलवाड़ा जिले के गुलाबपुरा कस्बे के एक साधारण परिवार में जन्मा राज दूसरी कक्षा तक पढ़ा हुआ है। आज उसके अभिनय की चमक में पढ़ाई में रही यह कमजोरी बहुत पीछे छूट गई है। हमसे बातचीत में उन्होंने अपने जीवन के हर पहलू पर चर्चा की। आपके हिसाब से राजस्थानी फिल्मों के पिछडऩे का क्या कारण है?
राजस्थानी फिल्मों के पिछडऩे का सबसे बडा कारण राज्य सरकार की बेरुखी है। पर्याप्त सुविधाएं एवं लोकेशन उपलब्ध नहीं होने के साथ ही सिनेमा हॉल नहीं मिलना भी बड़े कारण हैं, जिनकी वजह से राजस्थानी फिल्म जगत की कमर टूट रही है। दूसरे राज्यों की बात करें तो वहां की सरकारें फिल्मकारों को सब्सिडी देने के साथ ही अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने में भी पूरा सहयोग करती है। यही कारण है कि वहां का सिनेमा प्रगति कर रहा है। यदि समय रहते राज्य सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो राजस्थानी फिल्में इतिहास की बात बन जाएंगी और हम अपने बच्चों को बताया करेंगे, 'बेटा हमारे जमाने में राजस्थानी फिल्में बना करती थीं।'
ज्यादातर …

इमरान खान

जन्म : बीकानेर में।
पहली राजस्थानी फिल्म : ओढ़ ली चुनरिया।
अब तक : एक राजस्थानी फिल्म में नायक। दो  निर्माणाधीन हैं, जिनमें भी नायक की ही भूमिका में।  बॉलीवुड में भी एंट्री। घाव व कजरी फिल्में नजदीकी दिनों में ही होंगी रिलीज।
विशेष : हिंदी फिल्मों में सक्रिय लेकिन राजस्थानी सिनेमा से विशेष प्यार। पहली ही फिल्म को राजस्थानी भाषा में रिलीज होने वाली सौवीं फिल्म का गौरव।
इन दिनों : दो राजस्थानी व एक हिंदी फिल्म में अभिनय ।

क्या ये फिल्में सिनेमा हॉलों में लगती है?

यह हकीकत हमें स्वीकारनी पड़ेगी, कि शहरी लोगों को हमारी फिल्मों की खबर ही नहीं है शिवराज गूजर
मेरे एक अभिनेता मित्र और मैं कैंटीन में बैठे बात कर रहे थे। इसी दौरान हमारी एक साथी पत्रकार वहां आईं तो मैनें उन्हें उनसे परिचय कराने के लिए बुला लिया। जब मैंने उन्हें बताया कि ये राजस्थानी फिल्मों के हीरो हैं। उनकी फिल्म की एक सीडी भी उन्हें दिखाई। सीडी देखने के बाद उन्होंने सवाल किया-क्या ये फिल्में सिनेमा हॉल में लगती हैं? मैंने तो कभी इनके पोस्टर बाजार में लगे नहीं देखे।
उनके इस सवाल ने हमें बगलें झांकने पर मजबूर कर दिया। उनका यह सवाल बेमानी नहीं था। यह हकीकत हमें स्वीकारनी पड़ेगी, कि शहरी लोगों को हमारी फिल्मों की खबर ही नहीं है। कारण भी साफ है-हम प्रचार में तो पीछे हैं ही, राजस्थानी फिल्में मल्टीप्लेक्स में भी नहीं लगती। सिंगल स्क्रीन में लगती भी हैं तो वो भी ऐसे सिनेमा हॉल्स में जिनमें जयपुर के लोग जाना ही पसंद नहीं करते। ऐसे में फिल्म दो-तीन दिन से ज्यादा कैसे चल सकती है।
सोच बदलनी पड़ेगी 
जयपुर में राजस्थानी फिल्म कोई देखने ही नहीं आता, हमें इस सोच को बदलना पड़ेगा। फिल्म बनाते समय हमे…

'सुपात्तर बेटी' देखने उमड़ी महिलाएं

भीलवाड़ा के महाराणा टाकीज में हुई रिलीज, पहला शो ही हाउसफुल
भीलवाड़ा. निधि मूवीज की फिल्म सुपात्तर बेटी शुक्रवार को महाराणा टाकीज में रिलीज की गई। फिल्म को देखने महिलाओं की भीड़ उमड़ पड़ी। आलम यह था कि एक्स्ट्रा सीटें लगाने के बाद भी कई महिलाओं को खड़े-खड़े फिल्म देखनी पड़ी। लोगों का कहना था कि  बरसों बाद भीलवाड़ा में राजस्थानी फिल्म के लिए किसी टॉकीज में इतनी अधिक भीड़ देखने को मिली।
इससे पहले फिल्म के पहले शो में आयोजित रिलीज समारोह में महिला एवं बाल विकास विभाग की उपनिदेशक जाकिरा बेग ने कहा कि राजस्थानी फिल्म सुपात्तर बेटी देश की ज्वलंत समस्या दहेज के खिलाफ महिलाओं में जागरूकता लाएगी। ऐसी  संदेशप्रद फिल्मों से ही समाज का विकास संभव है। महिला अरबन को-ऑपरेटिव बैंक अध्यक्ष कीर्ति बोरदिया एवं समाजसेवी मंजू पोखरना ने भी फिल्म की प्रशंशा की। निर्माता राजू जांगिड़ ने अतिथियों का गुलदस्ता भेंट कर स्वागत किया। इस मौके पर रंगकर्मी कुलदीप टांक, असलम छीपा, पूर्व पार्षद योगेंद्रसिंह, शिवकंवर यदुवंशी सहित अन्य फिल्म प्रेमी और महिलाएं मौजूद थीं।  फिल्म के मुख्य कलाकार राज खन्ना, सुप्रेरणा सिंह, दि…

शशि शर्मा

जन्म : राजस्थान की राजधानी जयपुर।
पहली राजस्थानी फिल्म : चांदा थारे चांदणें।
अब तक : 5 राजस्थानी फिल्मों में नायिका के रूप में अभिनय। राजस्थानी फिल्मों से शुरुआत कर बॉलीवुड में सशक्त मुकाम बनाने वाली अभिनेत्री। बॉलीवुड के प्रसिद्ध निर्देशकों के साथ करीब 33 हिंदी फिल्मों में विभिन्न किरदार निभाए। विभिन्न चैनल्स के 64 चर्चित धारावाहिकों में अभिनय।  पैराशूट ऑयल समेत पांच विज्ञापन फिल्में भी कीं।
विशेष : राजस्थानी सिनेमा से विशेष प्यार। मन में एक कसक है कि मेरे प्रदेश का सिनेमा अन्य प्रदेशें की अपेक्ष पिछड़ गया है। इसके विकास के लिए बहुत कुछ करने की मंशा। फिल्मसिटी के लिए कुछ करने को मिले तो सहर्ष तैयार।
सम्मान-पुरस्कार : अजनबी, श्री कृष्णा और औरत धारावाहिक के लिए बेस्ट एक्ट्रेस व बेस्ट स्पोर्टिंग एक्ट्रेस अवार्ड।
इन दिनों : हिंदी फिल्म चुटकी बजा के कर रही हैं। इसके अलावा कई धारावाहिकों में अभिनय ।

सपना भी सच हुआ और सफलता भी मिली

माया नगरी में बिना किसी गॉडफादर के मुकाम बनाया जयपुर की शशि शर्मा ने
संतोष निर्मल

मुंबई माया नगरी है। यहां रोज सैकड़ों लोग फिल्मी दुनियां में छा जाने का सपना आंखों में लिए उतरते हैं, लेकिन इनमें से बिरले ही होते हैं, जिनका भाग्य साथ देता है। ऐसे ही बिरले लोगों में एक हैं जयपुर की शशि शर्मा हैं। कहते हैं कि फिल्मी दुनियां में बिना गॉडफादर के सफल होना टेढ़ी खीर है, शशि इस मिथक को तोडऩे वाले उन चंद कलाकारों में से हैं जिन्होंने अपने दम पर खुद के लिए जगह बनाई। उन्होंने प्रतिष्ठित बैनरों के साथ कई सुपरहिट फिल्मों में काम ही नहीं किया बल्कि अपने अभिनय से लोगों का ध्यान भी खींचा।
इस तरह हुई शुरुआत
शशि ने थियेटर के जरिए फिल्मों में एंट्री पाई। उनकी पहली फिल्म राजस्थानी थी। नाम था, चांदा थारे चांदणे। इसमें वे नायिका थीं और नायक थे भैरोंसिंह गुर्जर। इस फिल्म के मिलने की अपनी एक कहानी है। निर्देशक मोहन कविया उन दिनों अपनी फिल्म चांदा थारै चांदणा के लिए नायिका की तलाश में थे। एक शाम शशि का नाटक देखा तो बस तय कर लिया कि उनकी फिल्म की नायिका शशि ही होंगी। सन् 1987 में यह फिल्म प्रदर्शित हुई और अच्छी…

मैंने हमेशा नये कलाकारों को तरजीह दी

अपनी नई फिल्म 'बाई सुगना चाली सासरे' के लिए लोकेशन देखने जयपुर आए निर्माता-निर्देशक संदीप वैष्णव से बातचीत
शिवराज गूजर
जयपुर. मैने हमेशा नये कलाकारों को तरजीह दी है। यहां तक कि कई फिल्मों में तो मैनें ठेठ ग्रामीणों से भी अभिनय करवाया है। फिल्म तैयार होने के बाद मैने पाया कि उनके अभिनय में ज्यादा वास्तविकता थी। यह कहना है राजस्थानी फिल्मों के जाने-माने निर्माता निर्देशक संदीप वैष्णव का। वे इन दिनों अपनी नई फिल्म 'बाई सुगना चाली सासरे' की शूटिंग के लिए लोकशन देखने राजस्थान के दौरे पर हैं। पाली व बीकानेर होते हुए वे गुरुवार को जयपुर पहुंचे। इस दौरान उन्होंने अपनी आने वाली फिल्म के बारे में बताया। पाली, बीकानेर व जोधपुर सहित राजस्थान के लगभग सभी बड़े कस्बों में इसकी शूटिंग की जाएगी। इसके साथ ही मेरी कोशिश रहेगी कि मैं फिल्म में वहां के स्थानीय कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका दूं।
महिला प्रधान विषय से विशेष लगाव
मुझे नारी प्रधान विषय ज्यादा लुभाते हैं। मेरी पहली राजस्थानी फिल्म थारी-म्हारी भी नारी प्रधान फिल्म थी। इसके अलावा-मां थारी ओळ्यूं घणी आवे, घर मैं राज लुगायां क…

खबरों में रहोगे तो लोग जानेंगे

सिनेमा शो-बिज है, इसमें चर्चाओं में बने रहना जरूरी है, इस दुनिया का हिस्सा होते हुए भी हम पता नहीं क्यों अब तक यह नहीं समझ पाए शिवराज गूजर
बॉलीवुड-हॉलीवुड, टॉलीवुड और यहां तक कि भोजपुरी फिल्मों के स्टार टीवी और अखबारों के अलावा विभिन्न पत्रिकाओं में रोज दिखाई देते हैं। राजस्थानी फिल्मों के कलाकारों की स्थिति इसके उलट है। वे बिल्कुल भी दिखाई नहीं देते। पिछले दिनों राजस्थानी फिल्मां रो उच्छब आयोजन समिति की ओर से आयोजित गोष्ठी में यह बात उभरकर आई कि राजस्थानी सिनेमा के कलाकारों को मीडिया जगह नहीं देता। यहां तक कि राजस्थान के मीडिया में भी बाहर के कलाकार ही नुमाया होते हैं।
बात सही है, लेकिन इसके लिए मीडिया के साथ ही खुद कलाकार व राजस्थानी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोग भी पूरी तरह से जिम्मेदार है। न तो फिल्म का मुहुर्त होता है उसका किसी को पता होता है और ना ही इस बात का कि कहां शूटिंग चल रही है। जब तक इस तरह की खबरें मीडिया में नहीं जाएंगी लोगों को कैसे पता चलेगा कि कोई राजस्थानी फिल्म भी बन रही है। मीडिया ही एक ऐसा माध्यम है जो आपको और आपके उत्पाद को लोगों तक पहुंचाता और उनमें उसके प्रति …

हम आपके साथ हैं : राजीव अरोड़ा

 राजस्थानी फिल्मों पर गोष्ठी (दूसरी कड़ी): सेंसर बोर्ड के सदस्य राजीव अरोड़ा ने  इस बात से सहमति जताई कि सरकार को राजस्थानी फिल्मकारों की सहायता के लिए आगे आना चाहिए जयपुर. केंद्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड के सदस्य राजीव अरोड़ा ने राजस्थानी फिल्मां रो उच्छब आयोजन समिति की ओर से होटल लक्ष्मी विलास में आयोजित "पहचान क्यों नहीं बना पा रही हैं राजस्थानी फिल्में" विषयक गोष्ठी में कहा कि वे पूरी तरह से राजस्थानी फिल्मकारों के साथ हैं। वे उनकी समस्याओं को सरकार के सामने भी उठाएंगे। उन्होंने भी इस बात से सहमति जताई कि सरकार को राजस्थानी फिल्मकारों की सहायता के लिए आगे आना चाहिए। कम से कम शूटिंग के लिए लोकेशन तो निशुल्क ही देनी चाहिए।
एक कमेटी गठित हो
राजीव अरोड़ा ने कहा कि निशुल्क लोकेशंस उपलबध कराने में मुश्किल यह आती है कि यह पता नहीं चल पाता कि वह व्यक्ति वास्तव में राजस्थानी फिल्म बना रहा है या उसका दुरुपयोग तो नहीं कर रहा है। इसके लिए एक ऐसी कमेटी गठित की जानी चाहिए, जो राजस्थानी फिल्म निर्माताओं के लिए संस्तुति कर सके कि उन्हें लोकेशंस निशुल्क दी जाए। शूटिंग संबंधी नियमों का निर्धारण …

महंगी लोकेशन पर कैसे शूट हों राजस्थानी फिल्में : मोहन कटारिया

राजस्थानी फिल्मों पर गोष्ठी (पहली कड़ी) : मोहन कटारिया ने बताई निर्माता निर्देशकों के समक्ष आने वाली परेशानियां जयपुर. राजस्थानी फिल्मों के पिछडऩे का एक कारण यह भी है कि वह आज भी खेत- खलिहानों में ही शूट हो रही हैं। राजस्थानी फिल्मों के निर्माता की यही कोशिश रहती है कि कोई हवेली या कोठी उसे बिना पैसे दिए  शूटिंग के लिए मिल जाए तो काम चल जाए। पूरी ल्मि के निर्माण के दौरान इस काम चलाऊ आदत के कारण उसे कई समझौते भी करने पड़ते हैं। कभी-कभी स्थान के मालिक या उसके परिजनों- मित्रों को न चाहते हुए भी फिल्म में काम देना पड़ता है। इससे फिल्म की गुणवत्ता पर फर्क पड़ता है। यह कहना था निर्माता-निर्देशक- अभिनेता मोहन कटारिया का। वे राजस्थानी फिल्मां रो उच्छब आयोजन समिति की ओर से होटल लक्ष्मी विलास में आयोजित पहचान क्यों नहीं बना पा रही हैं राजस्थानी फिल्में विषयक गोष्ठी में बोल रहे थे। इस दौरान उन्होंने राजस्थानी फिल्मों से जुड़ी अनेक समस्याओं को उजागर किया।
सरकार का उपेक्षापूर्ण रवैया
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार राजस्थानी फिल्मों के साथ उपेक्षापूर्ण व्यवहार करती है। यहां की लोकेशन के रेट इतने अधिक ह…

विधवाओं के प्रति सोच बदलेगी "दूसरी विदाई"

आने वाली राजस्थानी फिल्म
फिल्म का नाम : दूसरी बिदाई
बैनर : राघव पिक्चर्स एण्ड ईन्टरटेनमेन्ट
कहानी : लोकेश मेनारिया
निर्देशक : लोकेश मेनारिया
कलाकार : मनीष कल्ला, अजयकरण, जाह्नवी, रमेश बोहरा, रेखा बालड़, गजेन्द्र शर्मा, अन्जना पालीवाल, दीपक दीक्षित, नीतु कच्छारा, आशु , नरेन्द्र आशियां एवं अन्य।
डाइरेक्टर की नजर में फिल्म
दूसरी बिदाई विधवा विवाह पर आधारित एक पारिवारिक फिल्म है। हिन्दी में तो विधवा विवाह पर कई फिल्में बनी हैं, जिनमें पुरानी में प्रेम रोग और नई में बाबुल प्रमुख है, पर राजस्थान में ऐसे प्रयास बहुत कम हुए हैं।
दूसरी विदाई इनसे थोड़ी हटकर है। इसमें विधवाओं की स्थिति दर्शाने के साथ ही कैसे उनका जीवनस्तर सुधारा जा सकता इस पर तो फोकस किया ही गया है, साथ ही इस बात को भी प्रमुखता से उभारा गया है कि हमें इस मर्दाना सोच को बदलना पड़ेगा कि आदमी तो पत्नी के होते हुए भी दूसरा विवाह कर सकता है लेकिन महिला पति के मरने के बाद विवाह करना तो दूर जीवन भी खुशी से नहीं जी सकती।
फिल्म एक ऐसी महिला की है जो एक अच्छे परिवार में सुखी जीवन जी रही है। अचानक विपदा उस पर टूटती है और उसके पति की मौत हो जाती…

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