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महाराष्ट्र की तर्ज पर हो अनुदान

फिल्म निर्माता निर्देशक के.सी. बोकाडिय़ा ने कहा कि राजस्थानी फिल्मों के विकास के लिए जरूरत है संवेदनशीलता से काम करने की।
सर्वेश भट्ट . जयपुर
सबसे पहले तो राजस्थान सरकार को इस बात के लिए धन्यवाद देना चाहूंगा कि उसने फिल्मों को मनोरंजन कर से पूर्णतया मुक्त करके एक महत्वपूर्ण कार्य किया है। यह भी खुशी का विषय है कि जवाहर कला केंद्र ने राजस्थानी फिल्मों को फिर से चर्चा का विषय बनाने के लिए इसका समारोह आयोजित किया है। केवल समारोह आयोजित करके ही हमें अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं कर देनी चाहिए। आज जरूरत है इस बात पर विचार करने की कि यहां के फिल्मकार ऐसा क्या बनाएं, जिससे राजस्थानी फिल्में देखने के लिए जनता सिनेमाघरों तक आने लग जाए। मैंने अपने तीस साल से भी अधिक के फिल्मी कॅरिअर में यह महसूस किया है कि लोगों में राजस्थान को देखने की भूख है। लोग यहां के रहन-सहन, पहनावे, खान-पान और यहां की स्थापत्य कला के दीवाने हैं, इसलिए यहां के फिल्मकार यदि पारिवारिक थीम के साथ यहां की ऐतिहासिक थीम पर फिल्में बनाएं तो यह प्रयास निश्चित ही कारगर सिद्ध हो सकता है।
बदले अनुदान देने का सिस्टम
राज्य सरकार की ओर से राजस्थानी फिल्मों के लिए 5 लाख तक सहायता दी जाती है, जो कि आज के लोगों की हाईटेक पसंद के आगे नाकाफी है। छोटे बजट में तो छोटा काम होगा। हमें टीवी सीरियल्स की तरह भाषा का प्रचार सिनेमा में करना होगा। महाराष्ट्र में भाषायी फिल्मों के लिए बीस लाख का अनुदान देती है, यह अनुदान निर्माता द्वारा एक फिल्म स्वयं के स्तर पर बनाने के बाद दूसरी फिल्म का निर्माण शुरू होने पर दिया जाता है। राजस्थान में भी यही नीति लागू होनी चाहिए।
भाषायी फिल्मों के कानून बने
यहां भाषायी फिल्मों के लिए कानून बनाने की भी जरूरत है। इसके तहत सिनेमाघरों को पाबंद किया जाना चाहिए कि वे साल में दो सप्ताह का समय राजस्थानी फिल्मों के प्रदर्शन के लिए आरक्षित रखें।
(source-citybhaskar,jaipur )

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